श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.2.24

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

वैश्वानरं याति विहायसा गतः

सुषुम्णया ब्रह्मपथेन शोचिषा।

विधूतकल्कोऽथ हरेरुदस्तात्

प्रयाति चक्रं नृप शैशुमारम्॥ २४

vaiśvānaraṃ yāti vihāyasā gataḥ

suṣumṇayā brahmapathena śociṣā|

vidhūtakalko'tha harerudastāt

prayāti cakraṃ nṛpa śaiśumāram|| 24

अर्थ

परीक्षित्! योगी ज्योतिर्मय मार्ग सुषुम्णाके द्वारा जब ब्रह्मलोककेलिये प्रस्थान करता है, तब पहले वह आकाशमार्गसे अग्‍निलोकमें जाता है; वहाँ उसके बचे-खुचे मल भी जल जाते हैं। इसके बाद वह वहाँसे ऊपर भगवान् श्रीहरिके शिशुमार नामक ज्योतिर्मय चक्रपर पहुँचता है॥ २४॥

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