॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.3.1
अथ तृतीयोऽध्यायः
कामनाओंके अनुसार विभिन्न देवताओंकी उपासना तथा भगवद्भक्तिके प्राधान्यका निरूपण
श्रीशुक उवाच
एवमेतन्निगदितं पृष्टवान् यद्भवान् मम।
नृणां यन्म्रियमाणानां मनुष्येषु मनीषिणाम्॥ १
evametannigaditaṃ pṛṣṭavān yadbhavān mama|
nṛṇāṃ yanmriyamāṇānāṃ manuṣyeṣu manīṣiṇām|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! तुमने मुझसे जो पूछा था कि मरते समय बुद्धिमान् मनुष्यको क्या करना चाहिये, उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया॥ १॥ जो ब्रह्मतेजका इच्छुक हो वह बृहस्पतिकी; जिसे इन्द्रियोंकी विशेष शक्तिकी कामना हो वह इन्द्रकी और जिसे सन्तानकी लालसा हो वह प्रजापतियोंकी उपासना करे॥ २॥ जिसे लक्ष्मी चाहिये वह मायादेवीकी, जिसे तेज चाहिये वह अग्निकी, जिसे धन चाहिये वह वसुओंकी और जिस प्रभावशाली पुरुषको वीरताकी चाह हो उसे रुद्रोंकी उपासना करनी चाहिये॥ ३॥ जिसे बहुत अन्न प्राप्त करनेकी इच्छा हो वह अदितिका; जिसे स्वर्गकी कामना हो वह अदितिके पुत्र देवताओंका, जिसे राज्यकी अभिलाषा हो वह विश्वेदेवोंका और जो प्रजाको अपने अनुकूल बनानेकी इच्छा रखता हो उसे साध्य देवताओंका आराधन करना चाहिये॥ ४॥