श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.3.16

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

वैयासकिश्‍च भगवान् वासुदेवपरायणः।

उरुगायगुणोदाराः सतां स्युर्हि समागमे॥ १६

vaiyāsakiśca bhagavān vāsudevaparāyaṇaḥ|

urugāyaguṇodārāḥ satāṃ syurhi samāgame|| 16

अर्थ

भगवन्मय श्रीशुकदेवजी भी जन्मसे ही भगवत्परायण हैं। ऐसे संतोंके सत्संगमें भगवान्‌के मंगलमय गुणोंकी दिव्य चर्चा अवश्य ही हुई होगी॥ १६॥✎ 127 128

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #127 शब्दोंके बीचका स्थान: है।ये → है। ये
  • #128 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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