श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.3.22

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

बर्हायिते ते नयने नराणां

लिङ्गानि विष्णोर्न निरीक्षतो ये।

पादौ नृणां तौ द्रुमजन्मभाजौ

क्षेत्राणि नानुव्रजतो हरेर्यौ॥ २२

barhāyite te nayane narāṇāṃ

liṅgāni viṣṇorna nirīkṣato ye|

pādau nṛṇāṃ tau drumajanmabhājau

kṣetrāṇi nānuvrajato hareryau|| 22

अर्थ

जो आँखें भगवान्‌की याद दिलानेवाली मूर्ति, तीर्थ, नदी आदिका दर्शन नहीं करतीं, वे मोरोंकी पाँखमें बने हुए आँखोंके चिह्नके समान निरर्थक हैं। मनुष्योंके वे पैर चलनेकी शक्ति रखनेपर भी न चलनेवाले पेड़ों-जैसे ही हैं, जो भगवान्‌की लीला-स्थलियोंकी यात्रा नहीं करते॥ २२॥✎ 129 130 131 132

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #129 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #130 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #131 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #132 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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