॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.4.1
अथ चतुर्थोऽध्यायः
राजाका सृष्टिविषयक प्रश्न और शुकदेवजीका कथारम्भ
सूत उवाच
वैयासकेरिति वचस्तत्त्वनिश्चयमात्मनः।
उपधार्य मतिं कृष्णे औत्तरेयः सतीं व्यधात्॥ १
vaiyāsakeriti vacastattvaniścayamātmanaḥ|
upadhārya matiṃ kṛṣṇe auttareyaḥ satīṃ vyadhāt|| 1
अर्थ
सूतजी कहते हैं—शुकदेवजीके वचन भगवत्तत्त्वका निश्चय करानेवाले थे। उत्तरानन्दन राजा परीक्षित्ने उन्हें सुनकर अपनी शुद्ध बुद्धि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें अनन्यभावसे समर्पित कर दी॥ १॥ शरीर, पत्नी, पुत्र, महल, पशु, धन, भाई-बन्धु और निष्कण्टक राज्यमें नित्यके अभ्यासके कारण उनकी दृढ़ ममता हो गयी थी। एक क्षणमें ही उन्होंने उस ममताका त्याग कर दिया॥ २॥ शौनकादि ऋषियो! महामनस्वी परीक्षित्ने अपनी मृत्युका निश्चित समय जान लिया था। इसलिये उन्होंने धर्म, अर्थ और कामसे सम्बन्ध रखनेवाले जितने भी कर्म थे, उनका संन्यास कर दिया। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णमें सुदृढ़ आत्मभावको प्राप्त होकर बड़ी श्रद्धासे भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा सुननेके लिये उन्होंने श्रीशुकदेवजीसे यही प्रश्न किया, जिसे आपलोग मुझसे पूछ रहे हैं॥ ३-४॥ ✎ 1580