॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.4.12
श्रीशुक उवाच
नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे
सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया ।
गृहीतशक्तित्रितयाय देहिना-
मन्तर्भवायानुपलक्ष्यवर्त्मने ॥ १२
namaḥ parasmai puruṣāya bhūyase
sadudbhavasthānanirodhalīlayā |
gṛhītaśaktitritayāya dehinā-
mantarbhavāyānupalakṣyavartmane || 12
अर्थ
श्रीशुकदेवजीने कहा—उन पुरुषोत्तम भगवान्के चरणकमलोंमें मेरे कोटि-कोटि प्रणाम हैं, जो संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी लीला करनेके लिये सत्त्व, रज तथा तमोगुणरूप तीन शक्तियोंको स्वीकार कर ब्रह्मा, विष्णु और शंकरका रूप धारण करते हैं; जो समस्त चर-अचर प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान हैं, जिनका स्वरूप और उसकी उपलब्धिका मार्ग बुद्धिके विषय नहीं हैं; जो स्वयं अनन्त हैं तथा जिनकी महिमा भी अनन्त है॥ १२॥