श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.21

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यदङ्घ्र्यभिध्यानसमाधिधौतया ✎ 2008

धियानुपश्यन्ति हि तत्त्वमात्मनः।

वदन्ति चैतत् कवयो यथारुचं

स मे मुकुन्दो भगवान् प्रसीदताम्॥ २१

yadaṅghryabhidhyānasamādhidhautayā

dhiyānupaśyanti hi tattvamātmanaḥ|

vadanti caitat kavayo yathārucaṃ

sa me mukundo bhagavān prasīdatām|| 21

अर्थ

विद्वान् पुरुष जिनके चरणकमलोंके चिन्तनरूप समाधिसे शुद्ध हुई बुद्धिके द्वारा आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं तथा उनके दर्शनके अनन्तर अपनी-अपनी मति और रुचिके अनुसार जिनके स्वरूपका वर्णन करते रहते हैं, वे प्रेम और मुक्तिके लुटानेवाले भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्‍न हों॥ २१॥✎ 134 135

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #134 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #135 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #2008 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): दङ्घ्रॺभिध्या → दङ्घ्र्यभिध्या

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