संत पुरुष जिनके मुखकमलसे मकरन्दके समान झरती हुई ज्ञानमयी सुधाका पान करते रहते हैं उन वासुदेवावतार सर्वज्ञ भगवान् व्यासके चरणोंमें मेरा बार-बार नमस्कार है॥ २४॥✎ 134135
नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय वेधसे।
पपुर्ज्ञानमयं सौम्या यन्मुखाम्बुरुहासवम्॥ २४
संत पुरुष जिनके मुखकमलसे मकरन्दके समान झरती हुई ज्ञानमयी सुधाका पान करते रहते हैं उन वासुदेवावतार सर्वज्ञ भगवान् व्यासके चरणोंमें मेरा बार-बार नमस्कार है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.4.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 198) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/4/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)