श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.30

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश।

दिग्वातार्कप्रचेतोऽश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः॥ ३०

vaikārikānmano jajñe devā vaikārikā daśa|

digvātārkapraceto'śvivahnīndropendramitrakāḥ|| 30

अर्थ

वैकारिक अहंकारसे मनकी और इन्द्रियोंके दस अधिष्ठातृ देवताओंकी भी उत्पत्ति हुई। उनके नाम हैं—दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्विनीकुमार, अग्‍नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और प्रजापति॥ ३०॥✎ 1289

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1289 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हु्ईं। → हुईं।

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