विद्वान् पुरुष (उपासनाके लिये) उसीके अंगोंमें समस्त लोक और उनमें रहनेवाली वस्तुओंकी कल्पना करते हैं। उसकी कमरसे नीचेके अंगोंमें सातों पातालकी और उसके पेड़ूसे ऊपरके अंगोंमें सातों स्वर्गकी कल्पना की जाती है॥ ३६॥✎ 139140
यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः।
कट्यादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः॥ ३६
विद्वान् पुरुष (उपासनाके लिये) उसीके अंगोंमें समस्त लोक और उनमें रहनेवाली वस्तुओंकी कल्पना करते हैं। उसकी कमरसे नीचेके अंगोंमें सातों पातालकी और उसके पेड़ूसे ऊपरके अंगोंमें सातों स्वर्गकी कल्पना की जाती है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 202) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/5/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)