श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.7

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स भवानचरद् घोरं यत् तपः सुसमाहितः।

तेन खेदयसे नस्त्वं पराशङ्कां प्रयच्छसि॥ ७

sa bhavānacarad ghoraṃ yat tapaḥ susamāhitaḥ|

tena khedayase nastvaṃ parāśaṅkāṃ prayacchasi|| 7

अर्थ

इस प्रकार सबके ईश्‍वर होकर भी आपने एकाग्रचित्तसे घोर तपस्या की, इस बातसे मुझे मोहके साथ-साथ बहुत बड़ी शंका भी हो रही है कि आपसे बड़ा भी कोई है क्या॥ ७॥

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