श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.15

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत्।

तेनेदमावृतं विश्‍वं वितस्तिमधितिष्ठति॥ १५

sarvaṃ puruṣa evedaṃ bhūtaṃ bhavyaṃ bhavacca yat|

tenedamāvṛtaṃ viśvaṃ vitastimadhitiṣṭhati|| 15

अर्थ

(कहाँतक गिनायें—) मैं, तुम, तुम्हारे बड़े भाई सनकादि, शंकर, देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, मृग, रेंगनेवाले जन्तु, गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, राक्षस, भूत-प्रेत, सर्प, पशु, पितर, सिद्ध, विद्याधर, चारण, वृक्ष और नाना प्रकारके जीव—जो आकाश, जल या स्थलमें रहते हैं—ग्रह-नक्षत्र, केतु (पुच्छल तारे) तारे, बिजली और बादल—ये सब-के-सब विराट् पुरुष ही हैं। यह सम्पूर्ण विश्‍व—जो कुछ कभी था, है या होगा—सबको वह घेरे हुए है और उसके अंदर यह विश्‍व उसके केवल दस अंगुलके* परिमाणमें ही स्थित है॥ १२—१५॥✎ 1290 1291

यह अर्थ श्लोक 12–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. *

    ब्रह्माण्डके सात आवरणोंका वर्णन करते हुए वेदान्त प्रक्रियामें ऐसा माना गया है कि—पृथ्वीसे दसगुना जल है, जलसे दसगुना अग्‍नि, अग्‍निसे दसगुना वायु, वायुसे दसगुना आकाश, आकाशसे दसगुना अहंकार, अहंकारसे दसगुना महत्तत्त्व और महत्तत्त्वसे दसगुनी मूल प्रकृति है। वह प्रकृति भगवान्‌के केवल एक पादमें है। इस प्रकार भगवान्‌की महत्ता प्रकट की गयी है। यह दशांगुलन्याय कहलाता है।

    (मुद्रित पृष्ठ 204)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1290 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
  • #1291 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,

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