श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.23

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तेषु यज्ञस्य१ पशवः सवनस्पतयः कुशाः।

इदं च देवयजनं कालश्चोरुगुणान्वितः॥ २३

teṣu yajñasya paśavaḥ savanaspatayaḥ kuśāḥ|

idaṃ ca devayajanaṃ kālaścoruguṇānvitaḥ|| 23

अर्थ

तब मैंने उनके अंगोंमें ही यज्ञके पशु, यूप (स्तम्भ), कुश, यह यज्ञभूमि और यज्ञके योग्य उत्तम कालकी कल्पना की॥ २३॥✎ 141 142

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—यज्ञेषु।

    (मुद्रित पृष्ठ 206)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #141 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #142 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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