॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.6.26
गतयो मतयः श्रद्धा प्रायश्चित्तं समर्पणम्।
पुरुषावयवैरेते२ सम्भाराः सम्भृता मया॥ २६
gatayo matayaḥ śraddhā prāyaścittaṃ samarpaṇam|
puruṣāvayavairete sambhārāḥ sambhṛtā mayā|| 26
अर्थ
ऋषिश्रेष्ठ! यज्ञके लिये आवश्यक पात्र आदि वस्तुएँ, जौ, चावल आदि ओषधियाँ, घृत आदि स्नेहपदार्थ, छः रस, लोहा, मिट्टी, जल, ऋक्, यजुः, साम, चातुर्होत्र, यज्ञोंके नाम, मन्त्र, दक्षिणा, व्रत, देवताओंके नाम, पद्धतिग्रन्थ, संकल्प, तन्त्र (अनुष्ठानकी रीति), गति, मति, श्रद्धा, प्रायश्चित्त और समर्पण—यह समस्त यज्ञ-सामग्री मैंने विराट् पुरुषके अंगोंसे ही इकट्ठी की॥ २४—२६॥✎ 141 142
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—रेतैः।