नारद! यह सम्पूर्ण विश्व उन्हीं भगवान् नारायणमें स्थित है जो स्वयं तो प्राकृत गुणोंसे रहित हैं, परन्तु सृष्टिके प्रारम्भमें मायाके द्वारा बहुत-से गुण ग्रहण कर लेते हैं॥ ३०॥✎ 141142
नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम्।
गृहीतमायोरुगुणः सर्गादावगुणः स्वतः॥ ३०
नारद! यह सम्पूर्ण विश्व उन्हीं भगवान् नारायणमें स्थित है जो स्वयं तो प्राकृत गुणोंसे रहित हैं, परन्तु सृष्टिके प्रारम्भमें मायाके द्वारा बहुत-से गुण ग्रहण कर लेते हैं॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.6.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 206) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/6/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)