॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.7.18
नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौच-
मापः शिखा धृतवतो विबुधाधिपत्यम्।
यो वै प्रतिश्रुतमृते न चिकीर्षदन्य-
दात्मानमङ्ग शिरसा१ हरयेऽभिमेने॥ १८
nārtho balerayamurukramapādaśauca-
māpaḥ śikhā dhṛtavato vibudhādhipatyam|
yo vai pratiśrutamṛte na cikīrṣadanya-
dātmānamaṅga śirasā haraye'bhimene|| 18
अर्थ
दैत्यराज बलिने अपने सिरपर स्वयं वामनभगवान्का चरणामृत धारण किया था। ऐसी स्थितिमें उन्हें जो देवताओंके राजा इन्द्रकी पदवी मिली, इसमें कोई बलिका पुरुषार्थ नहीं था। अपने गुरु शुक्राचार्यके मना करनेपर भी वे अपनी प्रतिज्ञाके विपरीत कुछ भी करनेको तैयार नहीं हुए। और तो क्या, भगवान्का तीसरा पग पूरा करनेके लिये उनके चरणोंमें सिर रखकर उन्होंने अपने-आपको भी समर्पित कर दिया॥ १८॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—मनसा।