श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.22

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

क्षत्रं क्षयाय विधिनोपभृतं महात्मा

ब्रह्मध्रुगुज्झितपथं नरकार्तिलिप्सु।

उ३द्धन्त्यसाववनिकण्टकमुग्रवीर्य-

स्त्रिःसप्तकृत्व उरुधारपरश्‍वधेन॥ २२

kṣatraṃ kṣayāya vidhinopabhṛtaṃ mahātmā

brahmadhrugujjhitapathaṃ narakārtilipsu|

uddhantyasāvavanikaṇṭakamugravīrya-

striḥsaptakṛtva urudhāraparaśvadhena|| 22

अर्थ

जब संसारमें ब्राह्मणद्रोही आर्यमर्यादाका उल्लंघन करनेवाले नारकीय क्षत्रिय अपने नाशके लिये ही दैववश बढ़ जाते हैं और पृथ्वीके काँटे बन जाते हैं, तब भगवान् महापराक्रमी परशुरामके रूपमें अवतीर्ण होकर अपनी तीखी धारवाले फरसेसे इक्कीस बार उनका संहार करते हैं॥ २२॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—उद्यन्‍नसाव०।

    (मुद्रित पृष्ठ 212)

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