श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.3

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

जज्ञे च कर्दमगृहे द्विज देवहूत्यां

स्त्रीभिः समं नवभिरात्मगतिं स्वमात्रे।

ऊचे ययाऽऽत्मशमलं गुणसङ्गपङ्क-

मस्मिन् विधूय कपिलस्य गतिं प्रपेदे॥ ३

jajñe ca kardamagṛhe dvija devahūtyāṃ

strībhiḥ samaṃ navabhirātmagatiṃ svamātre|

ūce yayā''tmaśamalaṃ guṇasaṅgapaṅka-

masmin vidhūya kapilasya gatiṃ prapede|| 3

अर्थ

नारद! कर्दम प्रजापतिके घर देवहूतिके गर्भसे नौ बहिनोंके साथ भगवान्‌ने कपिलके रूपमें अवतार ग्रहण किया। उन्होंने अपनी माताको उस आत्मज्ञानका उपदेश किया, जिससे वे इसी जन्ममें अपने हृदयके सम्पूर्ण मल—तीनों गुणोंकी आसक्तिका सारा कीचड़ धोकर कपिलभगवान्‌के वास्तविक स्वरूपको प्राप्त हो गयीं॥ ३॥✎ 145

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #145 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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