॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.7.30
गृह्णीत यद् यदुपबन्धममुष्य माता
शुल्बं सुतस्य न तु तत् तदमुष्य माति।
यज्जृम्भतोऽस्य वदने भुवनानि गोपी
संवीक्ष्य शङ्कितमनाः प्रतिबोधिताऽऽसीत्॥ ३०
gṛhṇīta yad yadupabandhamamuṣya mātā
śulbaṃ sutasya na tu tat tadamuṣya māti|
yajjṛmbhato'sya vadane bhuvanāni gopī
saṃvīkṣya śaṅkitamanāḥ pratibodhitā''sīt|| 30
अर्थ
उनकी माता उन्हें बाँधनेके लिये जो-जो रस्सी लायेंगी वही उनके उदरमें पूरी नहीं पड़ेगी, दो अंगुल छोटी ही रह जायगी। तथा जँभाई लेते समय श्रीकृष्णके मुखमें चौदहों भुवन देखकर पहले तो यशोदा भयभीत हो जायँगी, परन्तु फिर वे सँभल जायँगी॥ ३०॥