श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.36

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

कालेन मीलितधियामवमृश्य नॄणां ✎ 1000

स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः।

आविर्हितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यां

वेदद्रुमं विटपशो विभजिष्यति स्म॥ ३६

kālena mīlitadhiyāmavamṛśya nṝṇāṃ

stokāyuṣāṃ svanigamo bata dūrapāraḥ|

āvirhitastvanuyugaṃ sa hi satyavatyāṃ

vedadrumaṃ viṭapaśo vibhajiṣyati sma|| 36

अर्थ

समयके फेरसे लोगोंकी समझ कम हो जाती है, आयु भी कम होने लगती है। उस समय जब भगवान् देखते हैं कि अब ये लोग मेरे तत्त्वको बतलानेवाली वेदवाणीको समझनेमें असमर्थ होते जा रहे हैं, तब प्रत्येक कल्पमें सत्यवतीके गर्भसे व्यासके रूपमें प्रकट होकर वे वेदरूपी वृक्षका विभिन्‍न शाखाओंके रूपमें विभाजन कर देते हैं॥ ३६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1000 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नृणां → नॄणां

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