श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.38

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

यर्ह्यालयेष्वपि सतां न हरेः कथाः स्युः

पाखण्डिनो द्विजजना वृषला नृदेवाः।

स्वाहा स्वधा वषडिति स्म गिरो न यत्र

शास्ता भविष्यति कलेर्भगवान् युगान्ते॥ ३८

yarhyālayeṣvapi satāṃ na hareḥ kathāḥ syuḥ

pākhaṇḍino dvijajanā vṛṣalā nṛdevāḥ|

svāhā svadhā vaṣaḍiti sma giro na yatra

śāstā bhaviṣyati kalerbhagavān yugānte|| 38

अर्थ

कलियुगके अन्तमें जब सत्पुरुषोंके घर भी भगवान्‌की कथा होनेमें बाधा पड़ने लगेगी; ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य पाखण्डी और शूद्र राजा हो जायँगे, यहाँतक कि कहीं भी ‘स्वाहा’, ‘स्वधा’ और ‘वषट्कार’ की ध्वनि—देवता-पितरोंके यज्ञश्राद्धकी बाततक नहीं सुनायी पड़ेगी, तब कलियुगका शासन करनेके लिये भगवान् कल्कि अवतार ग्रहण करेंगे॥ ३८॥✎ 157

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #157 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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