श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.42

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

येषां स एव भगवान् दययेदनन्तः

सर्वात्मनाऽऽश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्।

ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां

नैषां ममाहमिति धीः श्‍वशृगालभक्ष्ये॥ ४२

yeṣāṃ sa eva bhagavān dayayedanantaḥ

sarvātmanā''śritapado yadi nirvyalīkam|

te dustarāmatitaranti ca devamāyāṃ

naiṣāṃ mamāhamiti dhīḥ śvaśṛgālabhakṣye|| 42

अर्थ

जो निष्कपटभावसे अपना सर्वस्व और अपने-आपको भी उनके चरणकमलोंमें निछावर कर देते हैं, उनपर वे अनन्तभगवान् स्वयं ही अपनी ओरसे दया करते हैं और उनकी दयाके पात्र ही उनकी दुस्तर मायाका स्वरूप जानते हैं और उसके पार जा पाते हैं। वास्तवमें ऐसे पुरुष ही कुत्ते और सियारोंके कलेवारूप अपने और पुत्रादिके शरीरमें ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ ऐसा भाव नहीं करते॥ ४२॥✎ 158 159 160

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #158 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #159 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #160 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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