॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.7.46
ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां
स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः।
यद्यद्भुतक्रमपरायणशीलशिक्षा-
स्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये॥ ४६
te vai vidantyatitaranti ca devamāyāṃ
strīśūdrahūṇaśabarā api pāpajīvāḥ|
yadyadbhutakramaparāyaṇaśīlaśikṣā-
stiryagjanā api kimu śrutadhāraṇā ye|| 46
अर्थ
जिन्हें भगवान्के प्रेमी भक्तोंका-सा स्वभाव बनानेकी शिक्षा मिली है, वे स्त्री, शूद्र, हूण, भील और पापके कारण पशु-पक्षी आदि योनियोंमें रहनेवाले भी भगवान्की मायाका रहस्य जान जाते हैं और इस संसारसागरसे सदाके लिये पार हो जाते हैं; फिर जो लोग वैदिक सदाचारका पालन करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ ४६॥✎ 158 159 160