श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.49

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

स श्रेयसामपि विभुर्भगवान् यतोऽस्य

भावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धिः।

देहे स्वधातुविगमेऽनुविशीर्यमाणे

व्योमेव तत्र पुरुषो न विशीर्यतेऽजः५॥ ४९

sa śreyasāmapi vibhurbhagavān yato'sya

bhāvasvabhāvavihitasya sataḥ prasiddhiḥ|

dehe svadhātuvigame'nuviśīryamāṇe

vyomeva tatra puruṣo na viśīryate'jaḥ|| 49

अर्थ

समस्त कर्मोंके फल भी भगवान् ही देते हैं। क्योंकि मनुष्य अपने स्वभावके अनुसार जो शुभकर्म करता है, वह सब उन्हींकी प्रेरणासे होता है। इस शरीरमें रहनेवाले पंचभूतोंके अलग-अलग हो जानेपर जब—यह शरीर नष्ट हो जाता है, तब भी इसमें रहनेवाला अजन्मा पुरुष आकाशके समान नष्ट नहीं होता॥ ४९॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—ऽतः।

    (मुद्रित पृष्ठ 217)

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