श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.6

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां

नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः।

दृष्ट्वाऽऽत्मनो भगवतो नियमावलोपं

देव्यस्त्वनङ्गपृतना घटितुं न शेकुः॥ ६

dharmasya dakṣaduhitaryajaniṣṭa mūrtyāṃ

nārāyaṇo nara iti svatapaḥprabhāvaḥ|

dṛṣṭvā''tmano bhagavato niyamāvalopaṃ

devyastvanaṅgapṛtanā ghaṭituṃ na śekuḥ|| 6

अर्थ

धर्मकी पत्‍नी दक्षकन्या मूर्तिके गर्भसे वे नर-नारायणके रूपमें प्रकट हुए। उनकी तपस्याका प्रभाव उन्हींके जैसा है। इन्द्रकी भेजी हुई कामकी सेना अप्सराएँ उनके सामने जाते ही अपना स्वभाव खो बैठीं। वे अपने हाव-भावसे उन आत्मस्वरूप भगवान्‌की तपस्यामें विघ्न नहीं डाल सकीं॥ ६॥ ✎ 148

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #148 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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