श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.11

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः।

लोकैरमुष्यावयवाः सपालैरिति शुश्रुम॥ ११

puruṣāvayavairlokāḥ sapālāḥ pūrvakalpitāḥ|

lokairamuṣyāvayavāḥ sapālairiti śuśruma|| 11

अर्थ

पहले आपने बतलाया था कि विराट् पुरुषके अंगोंसे लोक और लोकपालोंकी रचना हुई और फिर यह भी बतलाया कि लोक और लोकपालोंके रूपमें उसके अंगोंकी कल्पना हुई। इन दोनों बातोंका तात्पर्य क्या है?॥ ११॥✎ 166

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #166 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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