श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.23

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया।

विसृज्य वा यथा मायामुदास्ते साक्षिवद् विभुः॥ २३

yathā''tmatantro bhagavān vikrīḍatyātmamāyayā|

visṛjya vā yathā māyāmudāste sākṣivad vibhuḥ|| 23

अर्थ

भगवान् तो परम स्वतन्त्र हैं। वे अपनी मायासे किस प्रकार क्रीड़ा करते हैं और उसे छोड़कर साक्षीके समान उदासीन कैसे हो जाते हैं?॥ २३॥✎ 167 168

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #167 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #168 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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