श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.27

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सूत उवाच

स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः।

ब्रह्मरातो भृशं प्रीतो विष्णुरातेन संसदि॥ २७

sa upāmantrito rājñā kathāyāmiti satpateḥ|

brahmarāto bhṛśaṃ prīto viṣṇurātena saṃsadi|| 27

अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! जब राजा परीक्षित‍्ने संतोंकी सभामें भगवान्‌की लीला-कथा सुनानेके लिये इस प्रकार प्रार्थना की, तब श्रीशुकदेवजीको बड़ी प्रसन्‍नता हुई॥ २७॥✎ 169 170

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #169 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #170 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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