श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.25

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तथापि१ नाथमानस्य नाथ२ नाथय नाथितम्।

परावरे यथा रूपे जानीयां ते त्वरूपिणः॥ २५

tathāpi nāthamānasya nātha nāthaya nāthitam|

parāvare yathā rūpe jānīyāṃ te tvarūpiṇaḥ|| 25

अर्थ

नाथ! आप कृपा करके मुझ याचककी यह माँग पूरी कीजिये कि मैं रूपरहित आपके सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपोंको जान सकूँ॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—अथापि।

    (मुद्रित पृष्ठ 225)
  2. २

    प्रा० पा०—नाथनाथ जनार्चित।

    (मुद्रित पृष्ठ 225)

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