एक दिन वे यही चिन्ता कर रहे थे कि प्रलयके समुद्रमें उन्होंने व्यंजनोंके सोलहवें एवं इक्कीसवें अक्षर ‘त’ तथा ‘प’ को—‘तप-तप’ (‘तप करो’) इस प्रकार दो बार सुना। परीक्षित्! महात्मालोग इस तपको ही त्यागियोंका धन मानते हैं॥ ६॥
स चिन्तयन् द्व्यक्षरमेकदाम्भ-
स्युपाशृणोद् द्विर्गदितं वचो विभुः।
स्पर्शेषु यत्षोडशमेकविंशं
निष्किञ्चनानां नृप यद् धनं विदुः॥ ६
एक दिन वे यही चिन्ता कर रहे थे कि प्रलयके समुद्रमें उन्होंने व्यंजनोंके सोलहवें एवं इक्कीसवें अक्षर ‘त’ तथा ‘प’ को—‘तप-तप’ (‘तप करो’) इस प्रकार दो बार सुना। परीक्षित्! महात्मालोग इस तपको ही त्यागियोंका धन मानते हैं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 222) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/9/6/