प्रियवर! हम कुरुवंशियोंके परम सुहृद् और पूज्य वसुदेवजी, जो पिताके समान उदारतापूर्वक अपनी कुन्ती आदि बहिनोंको उनके स्वामियोंका सन्तोष कराते हुए उनकी सभी मनचाही वस्तुएँ देते आये हैं, आनन्दपूर्वक हैं न?॥ २७॥✎ 1861294
कच्चित्कुरूणां परमः सुहृन्नो
भामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः।
यो वै स्वसॄणां पितृवद्ददाति
वरान् वदान्यो वरतर्पणेन॥ २७
प्रियवर! हम कुरुवंशियोंके परम सुहृद् और पूज्य वसुदेवजी, जो पिताके समान उदारतापूर्वक अपनी कुन्ती आदि बहिनोंको उनके स्वामियोंका सन्तोष कराते हुए उनकी सभी मनचाही वस्तुएँ देते आये हैं, आनन्दपूर्वक हैं न?॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.1.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 238) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/1/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)