श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

कच्चित्कुरूणां परमः सुहृन्‍नो

भामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः।

यो वै स्वसॄणां पितृवद्ददाति

वरान् वदान्यो वरतर्पणेन॥ २७

kaccitkurūṇāṃ paramaḥ suhṛnno

bhāmaḥ sa āste sukhamaṅga śauriḥ|

yo vai svasṝṇāṃ pitṛvaddadāti

varān vadānyo varatarpaṇena|| 27

अर्थ

प्रियवर! हम कुरुवंशियोंके परम सुहृद‍् और पूज्य वसुदेवजी, जो पिताके समान उदारतापूर्वक अपनी कुन्ती आदि बहिनोंको उनके स्वामियोंका सन्तोष कराते हुए उनकी सभी मनचाही वस्तुएँ देते आये हैं, आनन्दपूर्वक हैं न?॥ २७॥✎ 186 1294

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #186 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1294 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राजसिंहा-सनपर → राजसिंहासनपर

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