श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

क्षेमं स कच्चिद्युयुधान आस्ते

यः फाल्गुनाल्लब्धधनूरहस्यः।

लेभेऽञ्जसाधोक्षजसेवयैव

गतिं तदीयां यतिभिर्दुरापाम्॥ ३१

kṣemaṃ sa kaccidyuyudhāna āste

yaḥ phālgunāllabdhadhanūrahasyaḥ|

lebhe'ñjasādhokṣajasevayaiva

gatiṃ tadīyāṃ yatibhirdurāpām|| 31

अर्थ

जिन्होंने अर्जुनसे रहस्ययुक्त धनुर्विद्याकी शिक्षा पायी है, वे सात्यकि तो कुशलपूर्वक हैं? वे भगवान् श्रीकृष्णकी सेवासे अनायास ही भगवज्जनोंकी उस महान् स्थितिपर पहुँच गये हैं, जो बड़े-बड़े योगियोंको भी दुर्लभ है॥ ३१॥✎ 187 1295 1296

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #187 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णु-भगवान् की → विष्णु-भगवान्‌की
  • #1295 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विष्णु-भगवान्‌की → विष्णुभगवान्‌की
  • #1296 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्वामि-कार्तिक → स्वामिकार्तिक

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