श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.44

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय

कर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम्।

नन्वन्यथा कोऽर्हति देहयोगं

परो गुणानामुत कर्मतन्त्रम्॥ ४४

ajasya janmotpathanāśanāya

karmāṇyakarturgrahaṇāya puṃsām|

nanvanyathā ko'rhati dehayogaṃ

paro guṇānāmuta karmatantram|| 44

अर्थ

उद्धवजी! भगवान् श्रीकृष्ण जन्म और कर्मसे रहित हैं, फिर भी दुष्टोंका नाश करनेके लिये और लोगोंको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये उनके दिव्य जन्म-कर्म हुआ करते हैं। नहीं तो, भगवान्‌की तो बात ही क्या—दूसरे जो लोग गुणोंसे पार हो गये हैं, उनमें भी ऐसा कौन है, जो इस कर्माधीन देहके बन्धनमें पड़ना चाहेगा॥ ४४॥✎ 189

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #189 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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