श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तस्य प्रपन्‍नाखिललोकपाना-

मवस्थितानामनुशासने स्वे।

अर्थाय जातस्य यदुष्वजस्य

वार्तां सखे कीर्तय तीर्थकीर्तेः॥ ४५

tasya prapannākhilalokapānā-

mavasthitānāmanuśāsane sve|

arthāya jātasya yaduṣvajasya

vārtāṃ sakhe kīrtaya tīrthakīrteḥ|| 45

अर्थ

अतः मित्र! जिन्होंने अजन्मा होकर भी अपनी शरणमें आये हुए समस्त लोकपाल और आज्ञाकारी भक्तोंका प्रिय करनेके लिये यदुकुलमें जन्म लिया है, उन पवित्रकीर्ति श्रीहरिकी बातें सुनाओ॥ ४५॥✎ 189

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
विदुरोद्धवसंवादे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #189 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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