श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.8

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

द्यूते त्वधर्मेण जितस्य साधोः

सत्यावलम्बस्य वनागतस्य।

न याचतोऽदात्समयेन दायं

तमो जुषाणो यदजातशत्रोः॥ ८

dyūte tvadharmeṇa jitasya sādhoḥ

satyāvalambasya vanāgatasya|

na yācato'dātsamayena dāyaṃ

tamo juṣāṇo yadajātaśatroḥ|| 8

अर्थ

दुर्योधनने सत्यपरायण और भोले-भाले युधिष्ठिरका राज्य जूएमें अन्यायसे जीत लिया और उन्हें वनमें निकाल दिया। किन्तु वनसे लौटनेपर प्रतिज्ञानुसार जब उन्होंने अपना न्यायोचित पैतृक भाग माँगा, तब भी मोहवश उन्होंने उन अजातशत्रु युधिष्ठिरको उनका हिस्सा नहीं दिया॥ ८॥ महाराज युधिष्ठिरके भेजनेपर जब जगद‍्गुरु भगवान् श्रीकृष्णने कौरवोंकी सभामें हितभरे सुमधुर वचन कहे, जो भीष्मादि सज्जनोंको अमृत-से लगे, पर कुरुराजने उनके कथनको कुछ भी आदर नहीं दिया। देते कैसे? उनके तो सारे पुण्य नष्ट हो चुके थे॥ ९॥ फिर जब सलाहके लिये विदुरजीको बुलाया गया, तब मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ विदुरजीने राज्यभवनमें जाकर बड़े भाई धृतराष्ट्रके पूछनेपर उन्हें वह सम्मति दी, जिसे नीति-शास्त्रके जाननेवाले पुरुष ‘विदुरनीति’ कहते हैं॥ १०॥

यह व्याख्या श्लोक 3.1.8 से 3.1.10 तककी एक साथ है।

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