श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यदा च पार्थप्रहितः सभायां

जगद‍्गुरुर्यानि जगाद कृष्णः।

न तानि पुंसाममृतायनानि

राजोरु मेने क्षतपुण्यलेशः॥ ९

yadā ca pārthaprahitaḥ sabhāyāṃ

jagadgururyāni jagāda kṛṣṇaḥ|

na tāni puṃsāmamṛtāyanāni

rājoru mene kṣatapuṇyaleśaḥ|| 9

अर्थ

महाराज युधिष्ठिरके भेजनेपर जब जगद‍्गुरु भगवान् श्रीकृष्णने कौरवोंकी सभामें हितभरे सुमधुर वचन कहे, जो भीष्मादि सज्जनोंको अमृत-से लगे, पर कुरुराजने उनके कथनको कुछ भी आदर नहीं दिया। देते कैसे? उनके तो सारे पुण्य नष्ट हो चुके थे॥ ९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें