उसी परार्धके अन्तमें जो कल्प हुआ था, उसे पाद्मकल्प कहते हैं। इसमें भगवान्के नाभिसरोवरसे सर्वलोकमय कमल प्रकट हुआ था॥ ३५॥✎ 248
तस्यैव चान्ते कल्पोऽभूद् यं पाद्ममभिचक्षते।
यद्धरेर्नाभिसरस आसील्लोकसरोरुहम्॥ ३५
उसी परार्धके अन्तमें जो कल्प हुआ था, उसे पाद्मकल्प कहते हैं। इसमें भगवान्के नाभिसरोवरसे सर्वलोकमय कमल प्रकट हुआ था॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 286) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/11/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)