॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.12.1
अथ द्वादशोऽध्यायः
सृष्टिका विस्तार
मैत्रेय उवाच
इति ते वर्णितः क्षत्तः कालाख्यः परमात्मनः।
महिमा वेदगर्भोऽथ यथास्राक्षीन्निबोध मे॥ १
iti te varṇitaḥ kṣattaḥ kālākhyaḥ paramātmanaḥ|
mahimā vedagarbho'tha yathāsrākṣīnnibodha me|| 1
अर्थ
श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! यहाँतक मैंने आपको भगवान्की कालरूप महिमा सुनायी। अब जिस प्रकार ब्रह्माजीने जगत्की रचना की, वह सुनिये॥ १॥ सबसे पहले उन्होंने अज्ञानकी पाँच वृत्तियाँ—तम (अविद्या), मोह (अस्मिता), महामोह (राग), तामिस्र (द्वेष) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) रचीं॥ २॥ ✎ 249