श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

ससर्जाग्रेऽन्धतामिस्रमथ तामिस्रमादिकृत्।

महामोहं च मोहं च तमश्चाज्ञानवृत्तयः॥ २

sasarjāgre'ndhatāmisramatha tāmisramādikṛt|

mahāmohaṃ ca mohaṃ ca tamaścājñānavṛttayaḥ|| 2

अर्थ

सबसे पहले उन्होंने अज्ञानकी पाँच वृत्तियाँ—तम (अविद्या), मोह (अस्मिता), महामोह (राग), तामिस्र (द्वेष) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) रचीं॥ २॥✎ 249

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #249 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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