इसी क्रमसे आन्वीक्षिकी१, त्रयी२, वार्ता३ और दण्डनीति४—ये चार विद्याएँ तथा चार व्याहृतियाँ५ भी ब्रह्माजीके चार मुखोंसे उत्पन्न हुईं तथा उनके हृदयाकाशसे ॐकार प्रकट हुआ॥ ४४॥
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तथैव च।
एवं व्याहृतयश्चासन् प्रणवो ह्यस्य दह्रतः॥ ४४
इसी क्रमसे आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—ये चार विद्याएँ तथा चार व्याहृतियाँ भी ब्रह्माजीके चार मुखोंसे उत्पन्न हुईं तथा उनके हृदयाकाशसे ॐकार प्रकट हुआ॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.12.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 291) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/12/44/
टिप्पणियाँ
१
मोक्ष प्राप्त करनेवाली आत्मविद्या।
(मुद्रित पृष्ठ 291)
२
स्वर्गादि फल देनेवाली कर्मविद्या।
(मुद्रित पृष्ठ 291)
३
खेती-व्यापारादि-सम्बन्धी विद्या।
(मुद्रित पृष्ठ 291)
४
राजनीति।
(मुद्रित पृष्ठ 291)
५
भूः, भुवः, स्वः—ये तीन और चौथी महःको मिलाकर, इस प्रकार चार व्याहृतियाँ आश्वलायनने अपने गृह्यसूत्रोंमें बतलायी हैं—‘एवं व्याहृतयः प्रोक्ता व्यस्ताः समस्ताः।’ अथवा भूः, भुवः, स्वः और महः—ये चार व्याहृतियाँ, जैसा कि श्रुति कहती है—‘भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयस्तासामु ह स्मैतां चतुर्थीमाह। वाचमस्य प्रवेदयते महः इत्यादि।