॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.12.45
तस्योष्णिगासील्लोमभ्यो गायत्री च त्वचो विभोः।
त्रिष्टुम्मांसात्स्नुतोऽनुष्टुब्जगत्यस्थ्नः प्रजापतेः॥ ४५
tasyoṣṇigāsīllomabhyo gāyatrī ca tvaco vibhoḥ|
triṣṭummāṃsātsnuto'nuṣṭubjagatyasthnaḥ prajāpateḥ|| 45
अर्थ
उनके रोमोंसे उष्णिक्, त्वचासे गायत्री, मांससे त्रिष्टुप्, स्नायुसे अनुष्टुप्, अस्थियोंसे जगती, मज्जासे पंक्ति और प्राणोंसे बृहती छन्द उत्पन्न हुआ। ऐसे ही उनका जीव स्पर्शवर्ण (कवर्गादि पंचवर्ग) और देह स्वरवर्ण (अकारादि) कहलाया॥ ४५-४६॥