श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.46

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

मज्जायाः पङ्क्तिरुत्पन्‍ना बृहती प्राणतोऽभवत्।

स्पर्शस्तस्याभवज्जीवः स्वरो देह उदाहृतः॥ ४६

majjāyāḥ paṅktirutpannā bṛhatī prāṇato'bhavat|

sparśastasyābhavajjīvaḥ svaro deha udāhṛtaḥ|| 46

अर्थ

उनके रोमोंसे उष्णिक्, त्वचासे गायत्री, मांससे त्रिष्टुप्, स्नायुसे अनुष्टुप्, अस्थियोंसे जगती, मज्जासे पंक्ति और प्राणोंसे बृहती छन्द उत्पन्‍न हुआ। ऐसे ही उनका जीव स्पर्शवर्ण (कवर्गादि पंचवर्ग) और देह स्वरवर्ण (अकारादि) कहलाया॥ ४५-४६॥

यह अर्थ श्लोक 45–46 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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