श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

परं शुश्रूषणं मह्यं स्यात्प्रजारक्षया नृप।

भगवांस्ते प्रजाभर्तुर्हृषीकेशोऽनुतुष्यति॥ १२

paraṃ śuśrūṣaṇaṃ mahyaṃ syātprajārakṣayā nṛpa|

bhagavāṃste prajābharturhṛṣīkeśo'nutuṣyati|| 12

अर्थ

राजन्! प्रजापालनसे मेरी बड़ी सेवा होगी और तुम्हें प्रजाका पालन करते देखकर भगवान् श्रीहरि भी तुमसे प्रसन्‍न होंगे। जिनपर यज्ञमूर्ति जनार्दन भगवान् प्रसन्‍न नहीं होते, उनका सारा श्रम व्यर्थ ही होता है; क्योंकि वे तो एक प्रकारसे अपने आत्माका ही अनादर करते हैं॥ १२-१३॥

यह अर्थ श्लोक 12–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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