अहो! सूकरके रूपमें आज यह कौन दिव्य प्राणी यहाँ प्रकट हुआ है? कैसा आश्चर्य है! यह अभी-अभी मेरी नाकसे निकला था॥ २१॥✎ 254
किमेतत्सौकरव्याजं सत्त्वं दिव्यमवस्थितम्।
अहो बताश्चर्यमिदं नासाया मे विनिःसृतम्॥ २१
अहो! सूकरके रूपमें आज यह कौन दिव्य प्राणी यहाँ प्रकट हुआ है? कैसा आश्चर्य है! यह अभी-अभी मेरी नाकसे निकला था॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 294) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/13/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#254 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् की → वराहभगवान्की