अपना खेद दूर करनेवाली मायामय वराहभगवान्की घुरघुराहटको सुनकर वे जनलोक, तपलोक और सत्यलोकनिवासी मुनिगण तीनों वेदोंके परम पवित्र मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे॥ २५॥✎ 254
निशम्य ते घर्घरितं स्वखेद-
क्षयिष्णु मायामयसूकरस्य।
जनस्तपःसत्यनिवासिनस्ते
त्रिभिः पवित्रैर्मुनयोऽगृणन् स्म॥ २५
अपना खेद दूर करनेवाली मायामय वराहभगवान्की घुरघुराहटको सुनकर वे जनलोक, तपलोक और सत्यलोकनिवासी मुनिगण तीनों वेदोंके परम पवित्र मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 294) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/13/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#254 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् की → वराहभगवान्की