श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तेषां सतां वेदवितानमूर्ति-

र्ब्रह्मावधार्यात्मगुणानुवादम् ।

विनद्य भूयो विबुधोदयाय

गजेन्द्रलीलो जलमाविवेश॥ २६

teṣāṃ satāṃ vedavitānamūrti-

rbrahmāvadhāryātmaguṇānuvādam |

vinadya bhūyo vibudhodayāya

gajendralīlo jalamāviveśa|| 26

अर्थ

भगवान्‌के स्वरूपका वेदोंमें विस्तारसे वर्णन किया गया है; अतः उन मुनीश्‍वरोंने जो स्तुति की, उसे वेदरूप मानकर भगवान् बड़े प्रसन्‍न हुए और एक बार फिर गरजकर देवताओंके हितके लिये गजराजकी-सी लीला करते हुए जलमें घुस गये॥ २६॥✎ 254

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #254 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् की → वराहभगवान्‌की

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