॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.13.37
दीक्षानुजन्मोपसदः३ शिरोधरं
त्वं प्रायणीयोदयनीयदंष्ट्रः।✎ 1883
जिह्वा प्रवर्ग्यस्तव४ शीर्षकं क्रतोः
सभ्यावसथ्यं चितयोऽस५वो हि ते॥ ३७
dīkṣānujanmopasadaḥ śirodharaṃ
tvaṃ prāyaṇīyodayanīyadaṃṣṭraḥ|
jihvā pravargyastava śīrṣakaṃ kratoḥ
sabhyāvasathyaṃ citayo'savo hi te|| 37
अर्थ
बार-बार अवतार लेना यज्ञस्वरूप आपकी दीक्षणीय इष्टि है, गरदन उपसद (तीन इष्टियाँ) हैं; दोनों दाढ़ें प्रायणीय (दीक्षाके बादकी इष्टि) और उदयनीय (यज्ञसमाप्तिकी इष्टि) हैं; जिह्वा प्रवर्ग्य (प्रत्येक उपसदके पूर्व किया जानेवाला महावीर नामक कर्म) है, सिर सभ्य (होमरहित अग्नि) और आवसथ्य (औपासनाग्नि) हैं तथा प्राण चिति (इष्टकाचयन) हैं॥ ३७॥
टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—भुजज्योप०।
- ४
प्रा० पा०—प्रवस्यास्तव।
- ५
प्रा० पा०—अवरं ते।