श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तद्भवान्दह्यमानायां सपत्नीनां समृद्धिभिः।

प्रजावतीनां भद्रं ते मय्यायुङ्क्तामनुग्रहम्॥ १०

tadbhavāndahyamānāyāṃ sapatnīnāṃ samṛddhibhiḥ|

prajāvatīnāṃ bhadraṃ te mayyāyuṅktāmanugraham|| 10

अर्थ

अपनी पुत्रवती सौतोंकी सुख-समृद्धिको देखकर मैं ईर्ष्याकी आगसे जली जाती हूँ। अतः आप मुझपर कृपा कीजिये, आपका कल्याण हो॥ १०॥✎ 258

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #258 शब्दोंके बीचका स्थान: जैसेकेलेके → जैसे केलेके

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