श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

सर्वाश्रमानुपादाय स्वाश्रमेण कलत्रवान्।

व्यसनार्णवमत्येति जलयानैर्यथार्णवम्॥ १७

sarvāśramānupādāya svāśrameṇa kalatravān|

vyasanārṇavamatyeti jalayānairyathārṇavam|| 17

अर्थ

जिस प्रकार जहाजपर चढ़कर मनुष्य महासागरको पार कर लेता है, उसी प्रकार गृहस्थाश्रमी दूसरे आश्रमोंको आश्रय देता हुआ अपने आश्रमद्वारा स्वयं भी दुःखसमुद्रके पार हो जाता है॥ १७॥

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