श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

दितिस्तु व्रीडिता तेन कर्मावद्येन भारत।

उपसङ्गम्य विप्रर्षिमधोमुख्यभ्यभाषत॥ ३२

ditistu vrīḍitā tena karmāvadyena bhārata|

upasaṅgamya viprarṣimadhomukhyabhyabhāṣata|| 32

अर्थ

विदुरजी! दितिको भी उस निन्दित कर्मके कारण बड़ी लज्जा आयी और वह ब्रह्मर्षिके पास जा, सिर नीचा करके इस प्रकार कहने लगी॥ ३२॥

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